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यज्ञ_में_पशुबलि_का_प्रचलन_कब_से_शुरू_हुआ? #जानिए

 #यज्ञ_में_पशुबलि_का_प्रचलन_कब_से_शुरू_हुआ

#जानिए


आचार्य क्षीरदंबक के तीन पुत्र थे।

नारद

राजकुमार वसु

स्वयं के पुत्र पर्वत।

जब आचार्य को चरणमहर्षि से यह पता चला कि उनके तीनों शिष्यों में से राजकुमार वसु और उनका पुत्र पर्वत नरकगामी होंगे तो उन्हें वैराग्य जागा और वे सन्यासी बन गए।


फिर कई सालो बाद उनका पुत्र पर्वत जब आचार्य बनकर अपने शिष्यों को शास्त्र पढ़ा रहा था तब उसने शास्त्रवचन कहे कि यज्ञ में "अजा" का होम करना चाहिए लेकिन उसने अजा का अर्थ बकरा किया लेकिन वास्तव में उनके पिता क्षीरदंबक आचार्य ने अजा का अर्थ दुबारा ना उगने वाली (अ+जा=जिसका दुबारा जन्म ना हो)एसी 3 साल पुरानी डांगर किया था।

 (जिस प्रकार चावल दोबारा ना उगने के गुण के कारण हमारे सभी पूजा विधि में चावल/अक्षत का उपयोग किया जाता है)


पर्वत आचार्य के द्वारा इस प्रकार पूर्ण ज्ञान ना होने के कारण अर्थ का अनर्थ कर दिया गया।


वेदों में अध्वर शब्द कई बार मिलता है जिसका अर्थ अहिंसक होता है  (अध्वर=अहिंसक)

यज्ञ एक हिंसा रहित कर्म है ,


गौमेध ,नरमेध, अश्वमेध आदि यज्ञ में मेध का अर्थ बुद्धि होता है।


 इसी प्रकार वेदों में अर्थ गूढ़ रहस्यो से भरे  हैं जिन्हें समझने के लिए निरूक्तियो की रचना की गई लेकिन निरूक्तियो में भी उनका वास्तविक अर्थ का अनुवाद नही हो पाने के कारण अर्थ का अनर्थ हो गया है।

 

भारतीय संस्कृति हमेशा से सेक्युलर (धर्म निरपेक्ष)रही है।

 हम यह नहीं कहते कि यही सत्य है ।और ना ही हमारे शास्त्रों में एसा लिखा है कि सत्य को इंकार करने वालो का कत्ल करो।


बल्कि हम आपस में प्रश्न पुछकर शास्त्रार्थ कर सत्य की खोज करते हैं और फिर हमें जो सही लगता है उसे हम चुनते हैं।


 इसलिए महावीर स्वामी के सभी गणधरो में से गौतमस्वामी सहित आठ गणधर ,पहले वेदो के महान ज्ञानी पंडित थे लेकिन महावीरस्वामी से शंका का समाधान होने पर वे उनके प्रमुख शिष्य बन गए।

उसी प्रकार वेद शास्त्रों का सही अर्थ आगम शास्त्रों द्वारा समझाने पर भारत में पशुबलि बंद हो चुकी है।


जिस प्रकार 2 गज की दूरी में "गज" का अर्थ हाथी भी होता है । 

और यही शास्त्रो का अधुरा ज्ञान ईरान से अरब गया तो वहा के लोगों द्वारा अनर्थ को ही धर्म मान लिया गया।

किंतु वास्तविकता तो यह है कि "अहिंसा ही परम धर्म" है।


आत्मा ही मोक्ष में परम पद पाकर

(परम- आत्मा)"परमात्मा" बनती है।।

अन्य पुण्यात्मा के लिए इष्ट यानी कि "ईश्वर" बनती है।

आत्मा ही Got the Destination होने से God कहलाती है।

भाग्य सम्पूर्ण होने से "भगवान" कहलाती है।

खुदा शब्द भी स्वधा शब्द से बना है जिसका अर्थ स्वयं  (भवसागर से) पार लगने वाली आत्मा है।

अल+इह+आह से बना अल्लाह शब्द में इह+आह का मतलब श्रेष्ट आत्माए है लेकिन आगे अल(the) लग जाने से अल्लाह को बहुवचन की जगह एकवचन मान लिया गया है।


मोक्ष प्राप्त आत्मा 

वेदनिय कर्म का नाश होने से "सर्वशक्तिमान" कहलाती है।


केवलज्ञान(सम्पुर्ण ज्ञान)पाने से "सर्वज्ञ" कहलाती है।


जीव मात्र पर दया,प्रेम और करुणा होने के कारण "परमकृपालु-दयावान" कहलाती है।


स्वयं अपने कर्मों के द्वारा अपना भाग्य लिखने के कारण "विधाता" कहलाती है।

शाश्वत होने से अजर-अमर अजन्मा कहलाती है।

सभी स्वर्गो से भी ऊपर मोक्ष मे स्थान पाने के कारण "ऊपरवाला" कहलाती है।

संपूर्ण ब्रह्मांड का कण-कण जीवसृष्टि से भरा होने के कारण "सृष्टि का निर्माता" कहलाती है।

भारतीय संस्कृति मानती है कि जीव ही शिव है।

 ।।आत्मा ही ब्रह्मा है।।

।।अहम ब्रह्मोस्मि।।

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